Thursday, June 22, 2017

किसी और से नही

किसी और से नही रोज़ खुद से ही लड़ रही हूं मैं
क्या चाहती हूं और क्या नही तय नही कर पा रही हूं मैं
सही गलत की पहचान नहीं कर पा रही हूं मैं
एक बेचैनी सी है मन में जिससे उलझ रही हूं मैं
किसी और से नही रोज़ खुद से ही लड़ रही हूं मैं।

याद आता है बीता वक़्त कुछ अच्छी  कुछ बुरी यादोँ के साथ
इन यादो के सहारे जी लूं या इन्हें भूल कर आगे निकल जाऊं
ये समझ नही पा रही हूँ मैं
क्या चाहती हूं और क्या नही तय नही कर पा रही हूं मैं
किसी और से नही रोज़ खुद से ही लड़ रही हूं मैं।
किसी और से नही रोज़ खुद से ही लड़ रही हूं मैं।

T@nu